करमा की थाप में बसती है गांव की संस्कृति, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा आज भी लोगों को जोड़ रही…..
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संपादकीय रिपोर्ट / दीपक गुप्ता…..✍️
सूरजपुर। छत्तीसगढ़ की लोक एवं आदिवासी संस्कृति अपनी सहजता, विविधता और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए देशभर में अलग पहचान रखती है। इसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है करमा नृत्य, जिसकी थाप पर गांव की मिट्टी, जंगल, खेत-खलिहान और लोकजीवन की भावनाएं जीवंत होती दिखाई देती हैं।
करम देव की लोक कथा :-
छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के अनेक आदिवासी एवं ग्रामीण समुदायों में करमा/करम पर्व से जुड़ी लोककथाएं पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में कथा के पात्र और घटनाओं में थोड़ा अंतर मिलता है, इसलिए इसे एक ही निश्चित धार्मिक कथा के रूप में नहीं, बल्कि लोकपरंपरा के रूप में समझना उचित है।
प्रचलित लोककथा के अनुसार एक परिवार में सात भाई थे। सभी भाई मेहनती थे और परिवार में सुख-समृद्धि थी। उनकी पत्नियां भी घर-परिवार की जिम्मेदारियां संभालती थीं। एक दिन परिवार के पुरुष बाहर गए हुए थे और घर की महिलाएं अन्य कार्यों में व्यस्त थीं। इसी दौरान करम वृक्ष की डाली का अपमान या उपेक्षा हुई। इससे परिवार के जीवन में विपत्तियां आने लगीं और सुख-समृद्धि समाप्त होने लगी।
जब भाइयों को इसका कारण पता चला तो उन्होंने करम देवता की आराधना की। करम देव की पूजा, व्रत और विधि-विधान से सम्मान करने के बाद परिवार की परेशानियां दूर होने लगीं और घर में फिर से सुख-शांति लौट आई।
इस लोककथा का मूल संदेश यही माना जाता है कि प्रकृति, पेड़-पौधों और जीवनदायिनी शक्तियों का सम्मान किया जाना चाहिए। करम वृक्ष को समृद्धि, उर्वरता और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है।
इसी विश्वास के साथ करमा पर्व में करम वृक्ष की डाली स्थापित कर उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद महिला-पुरुष सामूहिक रूप से करमा गीत गाते और नृत्य करते हैं। मांदर की थाप और लोकगीतों के माध्यम से करम देव से परिवार, खेत-खलिहान और समाज की खुशहाली की कामना की जाती है।
इस दृष्टि से करम देव की कथा केवल धार्मिक आस्था की कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध, सामूहिकता और अपनी लोकसंस्कृति को बचाए रखने का संदेश भी देती है।
करमा केवल नृत्य ही बल्कि आदिवासी समाज के एकता की सामुहिक परंपरा :-
करमा नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण एवं आदिवासी समाज की सामूहिक एकता, परंपरा, आस्था और जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है। विशेष अवसरों, पर्व-त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में जब मांदर, ढोलक और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज गूंजती है, तो वातावरण में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है।
मांदर की थाप पर झूम उठता है गांव :-
सूरजपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में करमा पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में समूह बनाकर नृत्य करते हैं। नृत्य की गति धीरे-धीरे बढ़ती है और मांदर की थाप के साथ कदमों का तालमेल वातावरण को उत्सवमय बना देता है। गीतों में प्रकृति, प्रेम, सामाजिक जीवन, खेती-किसानी, ऋतु परिवर्तन और लोक आस्थाओं की झलक देखने को मिलती है।
करमा नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसका सामूहिक स्वरूप है। इसमें किसी एक व्यक्ति की प्रधानता नहीं होती, बल्कि पूरा समूह एक लय और एक ताल में शामिल होकर अपनी संस्कृति को अभिव्यक्त करता है। यही सामूहिकता ग्रामीण समाज को आपस में जोड़ने का काम करती है।
प्रकृति से जुड़ा है करमा का भाव :-
करमा परंपरा में प्रकृति का विशेष महत्व है। पेड़-पौधे, जंगल, धरती और ऋतुओं के प्रति सम्मान लोकगीतों और नृत्य की भाव-भंगिमाओं में दिखाई देता है। यही कारण है कि करमा नृत्य को केवल एक लोकनृत्य के रूप में देखना इसकी व्यापक सांस्कृतिक भावना को सीमित कर देना होगा।
यह परंपरा हमें यह भी संदेश देती है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल आवश्यकता का नहीं, बल्कि सम्मान, सह-अस्तित्व और संवेदना का संबंध है।
नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी :-
आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के दौर में लोक परंपराओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन्हें अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाने की है। मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक लोकनृत्यों के लिए युवाओं की भागीदारी बेहद आवश्यक हो गई है।
करमा नृत्य को विद्यालयों, महाविद्यालयों, सांस्कृतिक आयोजनों और स्थानीय उत्सवों से जोड़कर नई पीढ़ी को इसकी जानकारी दी जा सकती है। बुजुर्गों और पारंपरिक कलाकारों के अनुभवों को दर्ज करना भी संस्कृति संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
लोक संस्कृति की पहचान को बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी :-
करमा नृत्य की थाप केवल ढोल-मांदर की आवाज नहीं है। यह उन पीढ़ियों की आवाज है, जिन्होंने अपनी मेहनत, प्रकृति से जुड़ाव और सामूहिक जीवन के अनुभवों को गीत और नृत्य के माध्यम से आगे बढ़ाया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि लोक संस्कृति को केवल मंचीय कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसके पीछे छिपे इतिहास, सामाजिक मूल्यों और प्रकृति के प्रति सम्मान को भी समझा जाए।
करमा की थाप जब गांव की गलियों में गूंजती है, तो वह हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देती है। यही लोक संस्कृति की शक्ति है—जो बदलते समय के बीच भी समाज को उसकी पहचान से जोड़कर रखती है।
करमा बचेगा तो लोक संस्कृति की वह जीवंत धारा भी बचेगी, जो पीढ़ियों को जोड़ती है और मिट्टी से मनुष्य का रिश्ता मजबूत करती है।