सुमन चेरवा की संदिग्ध मौत पर उठे गंभीर सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग तेज…..

 

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पहले आत्महत्या का निष्कर्ष कैसे? परिजनों को प्रक्रिया से दूर रखने और ₹20 हजार की सहायता राशि को लेकर भी सवाल….?

CG Samachar 24.in

संचालक :- दीपक गुप्ता….✍️

सूरजपुर। जिले के जरही-भटगांव थाना क्षेत्र से सामने आए लगभग 12 वर्षीय आदिवासी नाबालिग बालिका सुमन चेरवा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक गरीब आदिवासी परिवार की बच्ची की मौत के मामले में परिजन और ग्रामीण पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं।

मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बच्ची की मौत की वास्तविक वजह क्या थी और जांच पूरी होने से पहले ही इसे आत्महत्या मानने का आधार क्या था? परिजनों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने से पहले ही थाना स्तर से आत्महत्या की बात कही गई थी। यदि ऐसा हुआ है तो यह जांच की निष्पक्षता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

पोस्टमार्टम प्रक्रिया को लेकर भी सवाल…? :-

परिजनों का आरोप है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के दौरान उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई और उन्हें प्रक्रिया से दूर रखा गया। वहीं, मामले में डॉक्टरों की मौजूदगी तथा पुलिस की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग सवाल सामने आ रहे हैं।

यदि घटनास्थल का पंचनामा, शव परीक्षण, फोरेंसिक साक्ष्य और अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं, तो इन सभी की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। खासकर नाबालिग की संदिग्ध मौत के मामले में हर पहलू की जांच किए जाने की आवश्यकता है।

क्या मजिस्ट्रियल जांच वास्तव में निष्पक्ष होगी…? :-

मामले में कथित तौर पर मजिस्ट्रियल जांच की बात सामने आ रही है। ऐसे में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जांच किस स्तर पर और किस तरीके से की जा रही है।

परिजनों और ग्रामीणों की मांग है कि जांच केवल औपचारिकता तक सीमित न रहे, बल्कि घटनाक्रम से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के बयान लिए जाएं और उपलब्ध सभी साक्ष्यों की स्वतंत्र रूप से जांच की जाए।

जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि :-

– बच्ची की मौत की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं?
– पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण क्या सामने आया?
– पोस्टमार्टम से पहले आत्महत्या की बात किस आधार पर कही गई?
– घटनास्थल का पंचनामा किसकी मौजूदगी में तैयार हुआ?
– क्या पंचनामा और अन्य प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई?
– फोरेंसिक एवं अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखा गया या नहीं?
– बच्ची इतनी कम उम्र में घर से दूर काम क्यों कर रही थी?
– उसे काम पर कौन लेकर गया था और वहां उसकी देखरेख कौन करता था?
– मौत से पहले बच्ची किन लोगों के संपर्क में थी?
– घटना से पहले उसके साथ क्या परिस्थितियां बनीं?
– पुलिस अधीक्षक स्तर से यदि कोई निर्देश दिए गए थे तो उनका पालन किस स्तर तक हुआ?

₹20 हजार की सहायता राशि भी चर्चा में :-

मामले में परिवार को कथित तौर पर ₹20 हजार की राशि दिए जाने की बात भी सामने आ रही है। यदि यह सहायता राशि के रूप में दी गई है तो इसका आधिकारिक रिकॉर्ड और उद्देश्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।

पीड़ित परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सहायता देना अलग विषय है, लेकिन किसी भी आर्थिक सहायता को जांच या न्याय की प्रक्रिया से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। परिवार को सहायता के साथ-साथ निष्पक्ष जांच और न्याय का अधिकार भी मिलना चाहिए।

गरीब परिवार की बेटी की मौत का सच कब सामने आएगा…? :-

सुमन चेरवा की मौत ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक गरीब आदिवासी परिवार अपनी बच्ची की मौत का वास्तविक कारण जानना चाहता है।

परिजनों की मांग है कि मामले की जांच पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो तथा यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या प्रक्रिया संबंधी चूक सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि सुमन चेरवा की मौत आखिर किन परिस्थितियों में हुई?

क्या पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फोरेंसिक जांच से मौत की असली वजह स्पष्ट होगी?
क्या मजिस्ट्रियल जांच सभी सवालों के जवाब दे पाएगी..?
और क्या इस गरीब परिवार को अपनी बेटी की मौत का पूरा सच और न्याय मिल पाएगा…?

इन सवालों के जवाब अब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।

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