राजनीति का रसूख या कुछ और…? शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका….
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संचालक :- दीपक गुप्ता….✍️
सूरजपुर/ओड़गी। जिले के विकासखंड ओड़गी क्षेत्र के कई शासकीय स्कूलों में पदस्थ शिक्षक लंबे समय से अपनी मूल शैक्षणिक संस्था से दूर रहकर वैकल्पिक व्यवस्था के तहत प्रभारी छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। शिक्षकों के लंबे समय से छात्रावासों में जमे रहने के कारण क्षेत्र की शैक्षणिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बताया जा रहा है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और विद्यार्थियों के हित को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार से लेकर सरगुजा संभाग के अधिकारियों, जिला स्तर के आला अधिकारियों तथा विकासखंड शिक्षा अधिकारी स्तर से संबंधित शिक्षकों को उनकी मूल संस्था में वापस भेजने के निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद कई शिक्षक अब तक अपने मूल विद्यालयों में वापस नहीं लौटे हैं।
आदेश के बावजूद क्यों नहीं हो रहा पालन….?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब उच्च स्तर से लेकर जिला एवं विकासखंड स्तर तक शिक्षकों को उनकी मूल संस्था में वापस भेजने के निर्देश दिए जा चुके हैं, तो आखिर इन आदेशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है?
शिक्षकों का मूल दायित्व विद्यालयों में विद्यार्थियों को शिक्षा देना है। ऐसे में यदि शिक्षक लंबे समय तक अपने मूल विद्यालय से दूर रहकर छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी निभाते रहेंगे, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ने की आशंका है।
राजनीति का रसूख या कुछ और…?
मामले को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या किसी राजनीतिक रसूख या अन्य प्रभाव के चलते प्रशासनिक आदेशों के बावजूद संबंधित शिक्षक अपनी मूल संस्था में वापस नहीं जा रहे हैं?
आखिर ऐसी क्या वजह है कि आदेश जारी होने के बावजूद इन शिक्षकों को प्रभारी छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी से मुक्त कर मूल विद्यालयों में वापस नहीं भेजा जा रहा है? यह सवाल अब क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
हालांकि, इस संबंध में संबंधित शिक्षकों अथवा जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है, ताकि स्थिति की वास्तविकता स्पष्ट हो सके।
बच्चों के भविष्य पर उठ रहे सवाल…?
ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों के शासकीय विद्यालयों में शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ऐसे में यदि विद्यालयों में पदस्थ शिक्षक लंबे समय तक अन्य जिम्मेदारियों में बने रहते हैं, तो विद्यार्थियों की पढ़ाई और शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
एक ओर शासन-प्रशासन सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों के लंबे समय तक मूल संस्था से बाहर रहने का मामला व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
आदेशों पर अमल कब…?
अब सवाल यह है कि जब राज्य सरकार से लेकर जिला एवं विकासखंड स्तर तक शिक्षकों को उनकी मूल संस्था में वापस भेजने के निर्देश दिए जा चुके हैं, तो उन आदेशों को जमीन पर लागू कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या संबंधित अधिकारी इस मामले में गंभीरता से संज्ञान लेकर कार्रवाई करेंगे? क्या लंबे समय से प्रभारी छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में वापस भेजा जाएगा?
शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय में प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी आखिर कब तक? अब निगाहें जिम्मेदार अधिकारियों की कार्रवाई पर टिकी हैं।