अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस विशेष : श्रमिक हितों की रक्षा के आखिर कब वचनवद्ध होगीं सरकारें….? आज भी मजदूरों का हो रहा शोषण मुकदर्शक बने बैठे हैं कई श्रमिक संगठन….
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संपादक :- दीपक गुप्ता……✍️
1 मई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (मई दिवस) दुनिया भर के श्रमिकों के संघर्ष, बलिदान और उनके अधिकारों का सम्मान करने का दिन है। यह दिन 1886 में अमेरिका के शिकागो में मजदूरों द्वारा कार्य अवधि को 8 घंटे करने की मांग को समर्पित है। भारत में, यह दिवस 1923 से मनाया जा रहा है, जो श्रमिकों की एकता और मेहनत का जश्न है।
मजदूर दिवस (1 मई) की प्रमुख बातें :- इतिहास: 1 मई 1886 को, अमेरिका में ट्रेड यूनियनों ने 8 घंटे से अधिक काम न करने की हड़ताल की थी। इस आंदोलन में कई मजदूरों ने अपनी जान भी गंवाई थी।
उद्देश्य: मजदूरों को उनके हक (8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन) के प्रति जागरूक करना और उन्हें सम्मानित करना था ।
भारत में शुरुआत: भारत में पहली बार 1 मई 1923 को मद्रास (चेन्नई) में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान द्वारा मनाया गया था।
महाराष्ट्र दिवस: 1 मई 1960 को ही महाराष्ट्र राज्य की स्थापना हुई थी, इसलिए महाराष्ट्र में इस दिन को महाराष्ट्र दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
महत्व: यह दिन मजदूरों को एकजुट होकर अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देता है।
यह दिन सभी मेहनतकश लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक खास अवसर है।
भारत में एक मई का दिवस सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाना शुरू किया गया था। उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित कर लिया गया था। इस की शुरुआत भारती मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी। भारत में मद्रास के हाईकोर्ट सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया और एक संकल्प के पास करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाये। भारत समेत लगभग 80 देशों में यह दिवस पहली मई को मनाया जाता है। इसके पीछे तर्क है कि यह दिन अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस वेबैक मशीन के तौर पर प्रामाणित हो चुका है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है। उद्योगपति, मालिक या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझने लगे। लोकतन्त्रीय ढांचो में तो सरकार भी लोगों की तरफ़ से चुनी जाती है जो राजनीतिक लोगों को अपने देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं। वह प्रबंध चलाने के लिए मज़दूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और कानूनी व्यवस्था बनाऐ रखने के लिए वचनबद्ध होते हैं। मजदूरों और किसानों की बड़ी संख्या का राज प्रबंध में बड़ा योगदान है। सरकार की भूमिका औद्योगिक शान्ति, उद्योगपतियों और मज़दूरों दरमियान सुखदायक, शांतमयी और पारिवारिक संबंध कायम करना, झगड़े और टकराव की सूरत में उन का समझौता और सुलह करवाने का प्रबंध करना और उन के मसलों को औद्योगिक ट्रिब्यूनल कायम कर कर निरपेक्षता और पारदर्शी ढंग से कुदरती न्याय के उसूल के सिद्धांत अनुसार इंसाफ प्रदान करना और उन की बेहतरी के लिए समय -समय से कानूनी और विवरण प्रणाली निर्धारित करना है।
लेकिन भारत मे कुछ संस्थान (कंपनी) आज भी हैं जो श्रमिको का सम्मान नही बल्कि उनका शोषण करती हैं कई सिक्योरिटी सर्विसेस हैं जो अपने कार्यरत कर्मचारियों को सप्ताहिक अवकाश तक नही देते इसकी जायज मांग करने पर नौकरी से निकाल देने की धमकी देते हैं । नौकरी जाने के डर से कर्मचारी खुलकर आवाज भी नही उठा पाते हैं ।
इधर श्रमिक संगठनों ने भी श्रमिक हित मे बात करने के के विपरीत चुप्पी साधे बैंठे हैं ।
भारतीय संदर्भ में गुरु नानक देव ने किसानों, मजदूरों और कामगारों के हक में आवाज उठाई थी और उस समय के अहंकारी और लुटेरे हाकिम ऊँट पालक भागों की रोटी न खा कर उस का अहंकार तोड़ा और भाई लालो की काम की कमाई को सत्कार दिया था। गुरु नानक देव जी ने ‘काम करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध निकालना’ का संदेश दिया। गरीब मज़दूर और कामगार का विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश दिया। 1 मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय में मनाया जाता है।
महाराष्ट्र में इसी दिन (1 मई) को महाराष्ट्र दिवस के रुप मे मनाते हैं। महाराष्ट्र के सभी जिलों में मज़दूर दिवस मनाया जाता है। यहाँ जितने भी व्यापारी , कारीगर होते हैं वे सभी छुट्टी रखते हैं।

1 मई को मजदूरों का होना चाहिए सम्मान :- श्रम मामले के जानकारों का मानना है कि संस्थानों के रीड़ की हड्डी कहे जाने वाले विभिन्न शासकीय / अर्धशासकीय संस्थानों मे कार्यरत मजदुरों का अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के दिन उनका सम्मान होना चाहिए । उस दिन मजदूरों का सम्मान समारोह आयोजित कर उन्हें कोई उपहार देना , मिष्ठान खिलाना या उनके लिऐ सामुहिक भोज का प्रबंध करना चाहिए इसके बाद उन्हें अवकाश देना चाहिए एसा कुछ भारत की प्रमुख कंपनियां करती हैं पर कुछ संस्थानें अपने चंद रुपए बचाने के चक्कर मे मजदूरों को केवल छुट्टी देकर वाहवाही लूटने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ते ।
ठेका मजदूरों का है बुरा हाल :- भारत में सबसे ज्यादा बुरा हाल ठेका मजदूरों का है जिन्हें नाम मात्र की मजदुरी मिलती है जिनका ठेकेदारों द्वारा कभी भी सम्मान नही किया जाता गर्मी , ठण्ड और बारिश से जुझने वाले मजदूरों का ठेकेदारों द्वारा इस तरह से शोषण किया जाता है कि वे नौकरी जाने के डर से खुलकर विरोध तक नही कर पाते हैं ।
इधर केन्द्र सरकार भी मजदूरों के हित मे कई कानून बनाती है पर विभिन्न प्रदेशों की सरकारें जानबूझकर इसका परिपालन सुनिश्चित नही कराते ।
जिस कारण आये दिन मजदूरों की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है ।

