एसईसीएल प्रबंधन झिलमिली की उदासीनता – पानी में कोल डस्ट घुलने से बंजर हुऐ खेत दो गांवों में फसल की पैदावार घटी 70 प्रतिशत….
CG Samachar 24.in
संचालक :- दीपक गुप्ता…..✍️
सूरजपुर :- जिले के सीमावर्ती क्षेत्र से लगे कोरिया जिले के ग्राम पंचायत खोड़ स्थित झिलमिली भूमिगत खदान से निकलने वाले कोयला का डस्ट जिले के बड़सरा और बसकर के किसानों के लिए सिर दर्द बना हुआ है।
कोयले का डस्ट पानी के साथ मिलकर खेतों में जम गया है, जिससे कार्बन की मात्रा खेतों में बढ़ने से जमीन बंजर हो रही है। पैदावार 70 फीसदी घट गई है, जिससे दो गांव के 85 से अधिक किसान परेशान हैं। कई किसान ऐसे हैं, जिनकी खेती चौपट होने की कगार है।
गौरतलब हो कि सूरजपुर जिले के भैयाथान ब्लॉक अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत बड़सरा और बसकर झिलमिली भूमिगत खदान से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। खदान के ऊंचाई पर स्थिति होने से कोयले का डस्ट पहाड़ों और चट्टानों पर जम जाता है। इसके बाद जब बरसात होती है तो पानी में मिलकर वहीं डस्ट किसानों के खेतों तक पहुंचता है। ऐसा नहीं है कि इस काले पानी को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन एसईसीएल प्रबंधन की लापरवाही और मनमानी के कारण पिछले 10 सालों में एक स्टॉप डैम तक नहीं बनवाया जा सका।

धान की खेत में इस तरह जमी हुई है कोयले के डस्ट की परत :- डस्ट की परत पानी मे घुलकर किसानों के खेतों में पहुंच रहा है इस कोयले के काला पानी से फसल खराब हो रही है ।
जमी परत हटाने हर वर्ष पलटनी पड़ रही है मिट्टी :-
हर वर्ष दो गांव के 250 किसानों की 485 एकड़ से अधिक की धान की खेती वाले खेत में काला पानी जमा हो जाता है। इससे मिट्टी की ऊपरी सतह पर काली परत जमा हो जाती है। जब फिर से अगले साल धान की रोपाई करनी होती है तो बड़े और सक्षम किसान जेसीबी मशीन से मिट्टी की पलटी कराते हैं, लेकिन छोटे किसान नहीं करा पाते।
7 वर्षों में एसईसीएल झिलमिली मे बदले तीन महाप्रबंधक फिर भी समस्या जस की तस :- पिछले छह से सात वर्षों में झिलमिली खदान क्षेत्र में तीन महाप्रबंधक (जीएम) और तीन सब एरिया मैनेजर बदले जा चुके हैं। बावजूद इसके तथाकथित स्वीकृत तीनों स्टॉप डैम का निर्माण आज तक नहीं हो पाया है। एसईसीएल प्रबंधन ने पांच वर्ष पूर्व इसके निर्माण को मंजूरी देने की बात कही थी, पर जमीनी स्तर पर कोई कार्य नहीं हुआ।
क्षेत्र ड्राइजोन, फिर भी टैंकर नहीं भेजते :- एसईसीएल ने इन पंचायतों में सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत विकास कार्य नहीं कराया। बसकर गांव के जगनारायण सिंह, लक्ष्मी जायसवाल व कामेश्वर पैकरा ने बताया गांव में सड़क-पानी जैसी सुविधाएं भी नहीं हैं। इलाका ड्राइजोन है, 700 फीट तक पानी नहीं मिलता है। एसईसीएल ने आज तक एक टैंकर पानी नहीं भेजा।
स्टॉप डैम नहीं बनाया तो करेंगे आंदोलन :- बड़सरा और बसकर के प्रभावित किसानों के साथ जयकरण सिंह, महेंद्र सिंह, रूक्मणी, रामप्यारी ने बताया कि अगर समय रहते प्रदूषण नियंत्रण और स्टॉप डैम निर्माण का काम शुरू नहीं हुआ तो पूरा इलाका बंजर हो जाएगा। अगर खदान प्रबंधन ने अगले धान के सीजन तक स्टॉप डैम नहीं बनाया है आंदोलन करेंगे।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट :- वरिष्ठ वैज्ञानिक वीरेंद्र चौहान बताते हैं कि कार्बन की मात्रा बढ़ने से पीएच वैल्यू कम हो रही है । खेत में कोयले की परत जम रही है तो वहां मृदा प्रदूषण बढ़ रहा है। कोयले की फिल्म लेयर जमने से फसलों के लिए उपयोगी बैक्टीरिया और फंगस में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। बैक्टीरिया की क्षमता कमजोर होने से धान के साथ दूसरी इसके साथ ही मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ने से स्वाईल (मिट्टी) की पीएच वैल्यू भी कम होगी। पीएच वैल्यू प्रभावित होने से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता खत्म होती है। फसलों के पौधे कमजोर हो जाते हैं।
कई बार निविदा, पर ठेकेदारों में रुचि नहीं :- एसईसीएल बैकुंठपुर के महाप्रबंधक बीएन झा ने पत्रकारों को बताया कई बार निविदाए जारी की तो लेकिन निविदा निरस्त हो गई या ठेकेदारों ने रुचि नहीं दिखाई। आगामी बरसात से पहले तीनों प्रस्तावित स्टॉप डैमों का निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा, जिससे दूषित पानी की समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।


