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जशपुरिया ‘रात्रे’ का ‘अंधेरे’ में तीर: ₹50 लाख का नोटिस या पत्रकार का ‘मुँह फुलाने’ की फीस?…

CG Samachar 24.in

संचालक :- दीपक गुप्ता…..✍️

विशेष कटाक्ष

जशपुर – अंबिकापुर :- आजकल जशपुर के स्वास्थ्य विभाग में ‘चिरायु’ योजना से ज्यादा चर्चा ‘मानहानि’ की हो रही है। यहाँ के नोडल अधिकारी डॉ0 अरविंद कुमार रात्रे को शायद लगा कि वह अस्पताल में ‘मरीज’ देख रहे हैं, इसलिए उन्होंने अंबिकापुर के पत्रकार अमित पांडेय के सवाल पूछने पर उन्हें ₹50 लाख के मुआवजे वाला ‘कानूनी प्रिस्क्रिप्शन’ (नोटिस) थमा दिया।

डॉक्टर साहब का ‘लीगल चेकअप’: “लाइसेंस कहाँ है?” :- डॉक्टर साहब का तर्क इतना क्रांतिकारी है कि अगर आज बाबासाहेब अंबेडकर होते, तो शायद माथा पकड़ लेते। रात्रे साहब पूछते हैं- “अमित पांडेय, तुम्हारे पास पत्रकारिता की डिग्री और पंजीयन कहाँ है?”
हुजूर डॉक्टर साहब! पत्रकारिता कोई ‘हर्निया का ऑपरेशन’ नहीं है जिसके लिए सर्जिकल सर्टिफिकेट चाहिए। देश के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(A.) किसी डिग्री का मोहताज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एक नागरिक का सवाल पूछना ही उसकी पत्रकारिता है। लेकिन साहब को तो ‘रजिस्ट्रेशन’ वाली दूरबीन से ही सब कुछ देखने की आदत है।

चिरायु’ पर सवाल… और साहब को ‘एलर्जी’ हो गई :- जब पत्रकार अमित पांडेय ने ‘चिरायु’ योजना के क्रियान्वयन और सार्वजनिक धन के खर्च पर सवाल उठाए, तो डॉक्टर साहब को अचानक ‘मानहानि का इन्फेक्शन’ हो गया। साहब चाहते हैं कि पत्रकार पहले प्रयोगशाला में जाकर खबर का ‘ डीएनए टेस्ट’ कराए और फिर उसे गोल्ड मेडल की तरह पेश करे।

​शायद डॉक्टर साहब ने ‘हरिजय सिंह केस’ नहीं पढ़ा, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि पत्रकार कोई अदालत नहीं है जो ‘परम सत्य’ ही छापे। पत्रकार का काम सूचना देना है, और लोक सेवक का आचरण कांच के घर जैसा होता है— जिस पर जनता पत्थर नहीं, सवाल तो उठा ही सकती है!

₹50 लाख की ‘लॉटरी’ का सपना : – सबसे हास्यास्पद हिस्सा वह ‘5’ का अंक है जिसके पीछे सात शून्य लगे हैं। ₹50,00,000/-! जशपुर के जंगलों में मंगल ढूंढने निकले साहब को लगता है कि एक नोटिस भेजकर पत्रकार का बैंक बैलेंस खाली करवा लेंगे। कानून की भाषा में इसे SLAPP (Strategic Lawsuit Against Public Participation) कहते हैं, यानी ‘डराने के लिए दागा गया कानूनी गोला’। लेकिन अमित पांडेय का जवाब कोई साधारण कागज नहीं, बल्कि उन अफसरों के अहंकार पर एक ‘संवैधानिक सर्जिकल स्ट्राइक’ है।

अब ‘हकीम’ को ही ‘इलाज’ की जरूरत है :- जवाब स्पष्ट है कलम किसी सरकारी रजिस्ट्रेशन की गुलाम नहीं है। डॉक्टर साहब, अगली बार जब नोटिस भेजें, तो ‘चिरायु’ की फाइलों के साथ-साथ ‘भारत का संविधान’ भी पलट लीजिएगा। वहां लिखा है कि जनता का पैसा खर्च करोगे, तो पत्रकार सवाल पूछेगा ही।

डॉ0 रात्रे साहब, ₹50 लाख का डर दिखाकर आप सच का गला नहीं घोंट सकते। अगली बार बेहतर होगा कि आप योजना का सुधार करें, न कि पत्रकार के अधिकारों का ‘पोस्टमॉर्टम’! आजकल जशपुर के स्वास्थ्य विभाग में ‘चिरायु’ (Chirayu) योजना से ज्यादा चर्चा ‘मानहानि’ (Defamation) की हो रही है। यहाँ के नोडल अधिकारी डॉ. अरविंद कुमार रात्रे को शायद लगा कि वह अस्पताल में ‘मरीज’ देख रहे हैं, इसलिए उन्होंने अंबिकापुर के पत्रकार अमित पांडेय के सवाल पूछने पर उन्हें ₹50 लाख के मुआवजे वाला ‘कानूनी प्रिस्क्रिप्शन’ (नोटिस) थमा दिया।

डॉक्टर साहब का ‘लीगल चेकअप’: “लाइसेंस कहाँ है?” :- डॉक्टर साहब का तर्क इतना क्रांतिकारी है कि अगर आज बाबासाहेब अंबेडकर होते, तो शायद माथा पकड़ लेते। रात्रे साहब पूछते हैं- “अमित पांडेय, तुम्हारे पास पत्रकारिता की डिग्री और पंजीयन कहाँ है?”
हुजूर डॉक्टर साहब! पत्रकारिता कोई ‘हर्निया का ऑपरेशन’ नहीं है जिसके लिए सर्जिकल सर्टिफिकेट चाहिए। देश के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(A.) किसी डिग्री का मोहताज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एक नागरिक का सवाल पूछना ही उसकी पत्रकारिता है। लेकिन साहब को तो ‘रजिस्ट्रेशन’ वाली दूरबीन से ही सब कुछ देखने की आदत है।

चिरायु’ पर सवाल… और साहब को ‘एलर्जी’ हो गई! – : जब पत्रकार अमित पांडेय ने ‘चिरायु’ योजना के क्रियान्वयन और सार्वजनिक धन के खर्च पर सवाल उठाए, तो डॉक्टर साहब को अचानक ‘मानहानि का इन्फेक्शन’ हो गया। साहब चाहते हैं कि पत्रकार पहले प्रयोगशाला में जाकर खबर का ‘डीएनए टेस्ट’ कराए और फिर उसे गोल्ड मेडल की तरह पेश करे।

​शायद डॉक्टर साहब ने ‘हरिजय सिंह केस’ नहीं पढ़ा, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि पत्रकार कोई अदालत नहीं है जो ‘परम सत्य’ ही छापे। पत्रकार का काम सूचना देना है, और लोकसेवक (Public Servant) का आचरण कांच के घर जैसा होता है— जिस पर जनता पत्थर नहीं, सवाल तो उठा ही सकती है!

₹50 लाख की ‘लॉटरी’ का सपना :- सबसे हास्यास्पद हिस्सा वह ‘5’ का अंक है जिसके पीछे सात शून्य लगे हैं। ₹50,00,000/-! जशपुर के जंगलों में मंगल ढूंढने निकले साहब को लगता है कि एक नोटिस भेजकर पत्रकार का बैंक बैलेंस खाली करवा लेंगे। कानून की भाषा में इसे SLAPP (Strategic Lawsuit Against Public Participation) कहते हैं, यानी ‘डराने के लिए दागा गया कानूनी गोला’। लेकिन अमित पांडेय का जवाब कोई साधारण कागज नहीं, बल्कि उन अफसरों के अहंकार पर एक ‘संवैधानिक सर्जिकल स्ट्राइक’ है।

अब ‘हकीम’ को ही ‘इलाज’ की जरूरत है :- जवाब स्पष्ट है – कलम किसी सरकारी रजिस्ट्रेशन की गुलाम नहीं है। डॉक्टर साहब, अगली बार जब नोटिस भेजें, तो ‘चिरायु’ की फाइलों के साथ-साथ ‘भारत का संविधान’ भी पलट लीजिएगा। वहां लिखा है कि जनता का पैसा खर्च करोगे, तो पत्रकार सवाल पूछेगा ही।

​डॉ0 रात्रे साहब, ₹50 लाख का डर दिखाकर आप सच का गला नहीं घोंट सकते। अगली बार बेहतर होगा कि आप योजना का सुधार करें, न कि पत्रकार के अधिकारों का ‘पोस्टमॉर्टम’!

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